(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.140. अध्यायः 140
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रत्युपवासब्रह्मचर्यादीनां लक्षणकथनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच।

द्विजातयो व्रतोपेता हविस्ते यदि भुञ्जते।
अन्नं ब्राह्मणकामाय कथमेतत्पितामह॥ 13-140-1(86806)
भीष्म उवाच। 13-140-2x(7191)
अवेदोक्तव्रताश्चैव भुञ्जानाः कामकारणे।
वेदोक्तेषु तु भुञ्जाना व्रतलुप्ता युधिष्ठिर॥ 13-140-2(86807)
युधिष्ठिर उवाच। 13-140-3x(7192)
यदिदं तप इत्याहुरुपवासं पृथग्जनाः।
तपः स्यादेतदेवेह तपोऽन्यद्वाऽपि किं भवेत्॥ 13-140-3(86808)
भीष्म उवाच। 13-140-4x(7193)
मासार्धमासोपवासाद्यत्तपो मन्यते जनः।
आत्मतन्त्रोपघाती यो न तपस्वी न धर्मवित्॥ 13-140-4(86809)
त्यागस्य चापि सम्पत्तिः शिष्यते तप उत्तमम्।
सदोपवासी च भवेद्ब्रह्मचारी तथैव च॥ 13-140-5(86810)
मुनिश्च स्यात्सदा विप्रो देवांश्चैव सदा यजेत्।
कुटुम्बिको धर्मकामः सदाऽस्वप्नश्च मानवः॥ 13-140-6(86811)
अमृताशी सदा च स्यात्पवित्रं च सदा पठेत्।
ऋतवादी सदा च स्यान्नियतश्च सदा भवेत्॥ 13-140-7(86812)
विघसाशी कथं च स्यात्सदा चैवातिथिप्रियः।
अमृताशी सदा च स्यात्पवित्री च सदा भवेत्॥ 13-140-8(86813)
युधिष्ठिर उवाच। 13-140-9x(7194)
कथं सदोपवासी स्याद्ब्रह्मचारी च पार्थिव।
विघसाशी कथं च स्यात्कथं चैवातिथिप्रियः॥ 13-140-9(86814)
भीष्म उवाच। 13-140-10x(7195)
अन्तरा सायमाशं च प्रातराशं च यो नरः।
सदोपवासी भवति यो न भुङ्क्तेऽन्तरा पुनः॥ 13-140-10(86815)
भार्या गच्छन्ब्रह्मचारी ऋतौ भवति चैव ह।
ऋतवादी सदा च स्याद्दानशीलस्तु मानवः॥ 13-140-11(86816)
अभक्षयन्वृथा मांसममांसाशी भवत्युत।
दानं ददत्पवित्री स्यादस्वप्नश्च दिवाऽस्वपन्॥ 13-140-12(86817)
भृत्यातिथिषु यो भुङ्क्ते भुक्तवत्सु नरः सदा।
अमृतं केवलं भुङ्क्ते इति विद्धि युधिष्ठिर॥ 13-140-13(86818)
अभुक्तवत्सु नाश्नाति ब्राह्मणेषु तु यो नरः।
अभोजनेन तेनास्य जितः स्वर्गो भवत्युत॥ 13-140-14(86819)
देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च संश्रितेभ्यस्तथैव च।
अवशिष्टानि यो भुङ्क्ते तमाहुर्विघसाशिनम्॥ 13-140-15(86820)
तेषां लोका ह्यपर्यन्ताः सदने ब्रह्मणः स्मृताः।
उपस्थिता ह्यप्सरसो गन्धर्वैश्च जनाधिप॥ 13-140-16(86821)
देवतातिथिभिः सार्धं पितृभिश्चोपभुञ्जते।
रमन्ते पुत्रपौत्रैश्च तेषां गतिरनुत्तमा॥ ॥ 13-140-17(86822)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 140 ॥

Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Footnotes

7-140-2 कामकारणे इच्छया हेतुना भुञ्जना भोजनं कुर्वन्तु नाम॥ 7-140-4 आत्मतन्त्रं शरीररूपं कुटुम्बरूपं वा तदुपघाती॥ 7-140-6 अस्वप्नः स्वधर्मे जागरूकः। वेदांश्चैव सदा जपेदिति झ.पाठः॥ 7-140-8 सदा च स्यादस्वप्नश्च तथैव चेति ड.पाठः॥ 7-140-12 वृथा यज्ञादिनिमित्तं विना॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.